Wednesday, October 27, 2010

राम की अयोध्‍या अब बाकायदा राम की हो गई


प्रभात कुमार रॉय  
अयोध्‍या विवाद का आगाज़ तो वस्‍तुत: हुआ था एक सौ पच्‍चीस वर्ष पहले, जबकि सन् 1885 में जबकि निर्मोही अखाडे़ के महंत रघुवर दास की ओर से एक याचिका फैजाबाद के तत्‍कालीन जिला जज एफइए चैमियर की अदालत में दाखिल की गई। महंत रघुवर दास ने इस याचिका के तहत यह मांग की थी कि रामकोट पर विद्यमान बाबरी मस्जिद परिसर के अंदर मौजूद राम चबूतरे पर उनको राम मंदिर का निर्माण करने की इजाजत प्रदान की जाए। इस याचिका को जिला जज महोदय ने खारिज़ कर दिया, किंतु अपने फैसले में यह उल्‍लेखित किया कि जिस स्‍थान पर सन् 1528 में यहां पर बाबरी मस्जिद का निमार्ण किया गया, वस्‍तुत: पराम्‍परागत रूप से वह स्‍थान हिंदुओं का एक बेहद पवित्र स्‍थान रहा है। ब्रिटिश जिला जज चैमियर ने अपने ऐतिहासिक अदालती निणर्य में कहा कि यह तथ्‍य सुनिश्‍चत है कि मूलत: यह स्‍थान हिंदूओं का अत्‍यंत पवित्र स्‍थान है, किंतु 358 वर्ष के अंतराल के पश्‍चात इस मामले में यथास्थिति बनाए रखने के अतिरिक्‍त उनको कोई चारा नजर नहीं आता। अत: महंत रघुवर दास की याचिका को खारिज किया जाता है और इस स्‍थान पर राम मंदिर के निमार्ण की इजाजत कदाचित प्रदान नहीं की जा सकती।

आजादी के दौर में दिसंबर 1949 फैज़ाबाद में एक जिलाधीष महोदय थे श्रीमान के के नैय्यर साहब, उनके कार्यकाल में अयोघ्‍या नगरी के विवादित परिसर में भगवान राम, सीता ,लक्ष्‍मण ,हनुमान आदि की मूर्तियां प्रकट हुई। इन मूर्तियों की बाकायदा जिलाधीष के के नैय्यर की निगरानी में विवादित परिसर में प्राण प्रतिष्‍ठा की गई। रामचबूतरे पर मूर्तियों की प्राण प्रतिष्‍ठा के विरोध में थाना अयोध्‍या में मुस्लिम वक्‍फ़ बोर्ड की ओर से एक एफआईआर दर्ज कराई गई जिसे सबइंस्‍पेक्‍टर राम दूबे ने लिखा। इस तरह यह मुकदमा अदालत में 1949 से दायर किया गया। अदालत ने विवादित परिसर को सीलबंद करके इस पर ताला डाल दिया। सन् 1986 में इस मुकदमे में एक महत्‍वपूर्ण मका़म तब आया जबकि फैजाबाद के वकील उमेशचंद्र पांडे की अपील पर जिला जज कृष्‍ण मोहन पांडे ने विवादित परिसर का सीलबंद ताला खोल देने का हुक्‍म जारी कर दिया। इसी मक़ाम से अयोध्‍या विवाद ने एक बेहद हिंसक संघर्षपूर्ण रूख इख़त्‍यार किया। सन् 1984 के आम चुनाव भाजपा ने बुरी तरह शिकस्‍त खाई थी और संसद की मात्र दो सीटों पर विजयी रही। भारतीय जनता पार्टी को एक ऐसा मुद्दा मिल गया, जिसका गहन संबंध हिंदुओं की प्रबल धार्मिक आस्‍था से रहा। राम जन्‍म भूमि पर राम मंदिर का निमार्ण करने के प्रश्‍न पर भाजपा के नेता लालकृष्‍ण अडवाणी ने सोमनाथ मंदिर से अयोध्‍या तक की एक रथयात्रा आरम्‍भ की। इस रथयात्रा ने संपूर्ण राष्‍ट्र में खतरनाक सांप्रदायिक उन्‍माद को जन्‍म दिया। फलस्‍वरूप हिंदू-मुस्लिम दंगों की एक नई इबारत इतिहास में दर्ज की गई, जिसमें तकरीबन दस हजार बेगुनाह लोग बेमौत मारे गए। भाजपा को इसका बेहद राजनीतिक फायदा हुआ। पार्टी राम मंदिर की लहर पर चढ़कर 1991 के आम चुनाव में केंद्र में मुख्‍य विरोधी दल बन गई और 1991 में ही उत्‍तर प्रदेश में सत्‍तानशीन हो गई। कल्‍याण सिंह प्रदेश के मुख्‍यमंत्री पद पर विराजमान हो गए। राममंदिर का निमार्ण एक राजनीतिक मुद्दा बन गया। राम मंदिर के निर्माण आंदोलन बहुत तेज हो गया। रथयात्रा और कारसेवा के उन्‍मादी दौर में 23 जुलाई 1992 को सुप्रीम कोर्ट ने बाकायदा स्‍पष्‍ट आदेश दिया की विवादित परिसर को कोई कारसेवा अंजाम नहीं दी जा सकती। सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन करने का तत्‍कालीन मुख्‍यमंत्री कल्‍याण ने लिखित आश्‍वासन दिया। 6 दिसंबर सन् 1992 में अयोध्‍या के रामकोट पर मौजूद विवादित परिसर में क्‍या कुछ घटित हुआ, सब जानते हैं कि बाबरी मस्जिद के ढॉंचे को तहस नहस कर दिया गया। यहां पर सुप्रीम कोर्ट के हुक्‍म की धज्जियां उड़ गई। इसके बाद देश भर में दंगों का दौर फिर से शुरू हो गया।

ऐतिहासिक तौर पर अयोध्‍या नगरी को सदैव से ही भगवान राम की नगरी के रूप में जाना पहचाना जाता है। बाबरी मस्जिद को सन् 1528 में निर्मित किया गया, इस तथ्‍य से कोई पक्ष इंकार नहीं करता। किंतु क्‍या इसका निर्माण राम मंदिर को ध्‍वस्‍त करके किया गया था, जहॉं कि राम लला का जन्‍म हुआ था, बस यह विवादित तथ्‍य रहा। इस तथ्‍य को तय करने में अदालत ने 61 वर्षो का समय ले लिया। यह फैसला यदि जल्‍द ही हो गया होता तो राम मंदिर निमार्ण आंदोलन के कारण हुए दंगों में इतने सारे इंसानों का रक्‍त नहीं बहता। न्‍यायिक विलंब देश के लिए कितना भयावह सिद्ध हो सकता है, राम मंदिर बनाम बाबरी मस्जिद मुकदमा इसकी मिसाल बन चुका है। अब तो हाई कोर्ट ने फैसला सुना दिया है कि विवादित परिसर का कुल रकबा तकरीबन ढाई एकड़ का है, जिसको बाकायदा बराबर तीन हिस्‍सों में तक़सीम कर दिया जाए। एक हिस्‍से को जिसे गर्भग्रह कहा जाता है, जहां कि गुबंद के नीचे राम लला की मूर्तिया स्‍थापित रही हैं, उसे राममंदिर ट्रस्‍ट के हवाले कर दिया जाए। दूसरे हिस्‍से की मिल्कियत निर्मोही अखाडे़ को प्रदान की गई, जहां कि सीता रसोई आदि स्‍थल विद्यमान हैं। तीसरे भाग का मालिकाना हक़ सेंट्रल वक्‍फ़ बोर्ड को होगा। संपूर्ण मामले पर हाई कोर्ट के तीनो न्‍यायाधीषों की तीन मुखतलिफ राय रही। बस एक तथ्‍य पर वे एकमत रहे कि विवादित परिसर के गर्भ गृह पर हिंदूओं का दावा साबित होता है। जस्टिस शर्मा की राय रही कि संपूर्ण परिसर पर राम मंदिर का ही है और विवादित ढांचे का निमार्ण राम मंदिर को ध्‍वस्‍त करके किया गया। अत: संपूर्ण परिसर पर हिंदूओ का हक़ साबित होता है। जस्टिस अग्रवाल ने सबसे लंबा फैसला लिखा और पुरातत्‍व सर्वेक्षण विभाग के साक्ष्‍यो को अदालत ने स्‍वीकार किया। जस्टिस एस यू खान ने कहा कि विवादित ढॉचे की तशकील राम मंदिर को ध्‍वस्‍त करके नहीं की गर्इ। जस्टिस अग्रवाल और जस्टिस खान ने विवादित परिसर को तीन हिस्‍सों में बराबर तक़सीम करने का फैसला सुनाया। अभी तक जो प्रतिक्रियाएं सामने आई उनमें सभी हिंदू संगठन अदालत के फैसले संतुष्‍ट प्रतीत हुए। उन्‍होने मुसलमानों को विवादित परिसर का एक हिस्‍सा देने पर कोई ऐतराज प्रकट नहीं किया। सेंट्रल मुस्लिम वक्‍फ़ बोर्ड अदालती निर्णय से संतुष्‍ट नहीं है अत: इसके बरखिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाएगा।
अदालत को फैसला करने में बहुत वक्‍त़ लगा किंतु देर आए दुरूस्‍त आए चलो यही सही। इस मुकदमें में पक्षकार कोई भी क्‍यों न रहे, किंतु समस्‍त देश इसकी चपेट में आ गया। कानून के राज में और अदालत के निणर्य में विश्‍वास करोगे तो लोकतंत्र कायम रहेगा अन्‍यथा इसकी धज्जियां बिखर जाएगीं। सुप्रीम कोर्ट ने 23 सितंबर को मामले पर स्‍टे प्रदान करके फिर उसे फिर उसे त्‍वरित सुनवाई के पश्‍चात खारिज करके जैसी तेजी दिखाई अगर वैसी ही तीव्रता हाई कोर्ट एवं अन्‍य अदालते भी दिखलाएं तो भारतीय लोकतंत्र और न्‍यायपालिका से निरंतर उठता जाता यकीन पुन: कायम हो सकता है। अब अयोध्‍या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट की गति की परीक्षा होनी है, क्‍योंकि मामला सर्वोच्‍च अदालत के समक्ष पेश होगा ही।
(लेखक : पूर्व प्रशासनिक अधिकारी हैं)
(साभार : जनोक्ति डॉट कॉम, 04/10/2010)

 

मत उठाओ राम का शोर, अब पेट भरा है

आशुतोष
मेरे अंदर का पत्रकार जन्म ले रहा था और देश में चार धाराएं एक साथ ऐसी चल रही थीं। अयोध्या का आंदोलन उफान पर था। चारों दिशाओं में राम के नाम की गूंज थी। मेरे घर में मेरा छोटा भाई मेरे खिलाफ खड़ा था। यूनिवर्सिटी में दोस्त झगड़ा कर रहा था कि मुझे क्या पता पिछड़ी जाति का होने का दर्द क्या होता है? राजीव गोस्वामी जैसे लड़के अपने बदन में आग लगा रहे थे। मंडल की वजह से करीबी एक-दूसरे पर शक करने लगे थे। और कश्मीरियों को लगने लगा था कि हिंदुस्तान के साथ उनकी किस्मत नहीं जुड़ी रह सकती, आजाद होना ही बेहतर है। और एक दिन अचानक पता चला कि सरकार को सोना गिरवी रखना पड़ेगा। इस बीच चुनाव सिर पर आन पड़े और राजीव गांधी तमिल आतंकवाद का शिकार हो गए। प्रधानमंत्री के बनने के लिए नेताओं की खोज हुई और रिटायर्ड नरसिंम्हा राव में कांग्रेस को अपना और देश का भविष्य नजर आया। राम मंदिर के नारे तेज होते गए और कैलेंडर की एक तारीख 6 दिसंबर 1992 को मस्जिद को ढहा दिया गया। आज फिर 24 सितंबर पर सबकी नजर है, जब अयोध्या मसले पर अदालत का फैसला आएगा। जिन्होंने 1992 देखा है उनका दिल हलकान है और जो आर्थिक सुधार की पैदावार हैं वो कौतुहल से टकटकी लगाए बैठे हैं।
कहने को कह सकते हैं कि राम मंदिर का मुद्दा अपनी उम्र जी चुका। लेकिन जो दूध के जले हैं वो क्या करें? अयोध्या में धारा 144 लगी है। केंद्र और राज्य सरकार दोनों ने अपने को आशंकाओं के किले में बंद कर लिया है। सब जानते हैं कि 92 की भूमिका अचानक नहीं बनी थी। ये वो दौर था जब आजादी के बाद के तीस सालों का तिलस्म टूट चुका था। समाजवादी रास्ते से देश की समस्याओं का हल निकालने की कोशिश दम तोड़ चुकी थी। बैंकों का राष्ट्रीयकरण करने वालीं इंदिरा गांधी को 1980 में सत्ता में आते ही एहसास हो चुका था कि गरीबी हटाओ के टोटके फेल हो चुके हैं। और अब कमांड इकॉनमी का रास्ता छोड़ना ही ठीक होगा। लेकिन नेहरू की बेटी में इतनी हिम्मत नहीं थी कि रातोंरात वो ये फैसला कर ले। हालांकि धारा बदलने का काम शुरू हो चुका था पर इंदिरा की असमय मौत और राजीव की अनुभवहीनता ने इस प्रक्रिया को तेज होने से रोक दिया। राजीव आधुनिकता की बात करते थे। टेलीकॉम क्रांति की शुरुआत उनके समय में हुई लेकिन दिल कड़ा करके लाइसेंस परमिट राज को खत्म करने का माद्दा उनमें नहीं था। फिर बोफोर्स कांड नेसारे किए कराए पर पानी फेर दिया। 'सर्वशक्तिमान' प्रधानमंत्री अपने बचाव में इतना डूबा कि सारे फैसले गलत होने लगे। फिर चाहे वो शाह बानो का मसला हो या फिर राममंदिर के ताले खुलवाने का। लोगों ने जब देखा कि सौ में से सिर्फ 15 पैसे जनता तक पहुंचने की बात कहने वाला ही 65 करोड़ के घूसकांड में फंस गया है तो वो कैसे मान लेते कि भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई निर्णायक लड़ाई कांग्रेस की सरकार लड़ेगी।
 
1990 पहुंचते-पहुंचते दलित और पिछड़े वर्ग में भी आकांक्षाओं ने हिलोरे मारना शुरू कर दिया था। अब वो जगजीवन राम की तरह सिर्फ ऊंची जातियों के शो-पीस बनने को तैयार नहीं थे। उन्हें सत्ता में भागीदारी चाहिए थी। मांग उठने लगी कि संख्याबल में ज्यादा हैं तो सत्ता भी हमारी हो। दबाव बना तो वी पी सिंह को सरकारी नौकरियों में 27 फीसदी आरक्षण देना पड़ा। मुलायम, लालू, रामविलास पासवान, शरद यादव, नीतीश कुमार, कांशीराम, मायावती, कल्याण सिंह, उमा भारती सत्ता के नए केंद्र हो गए। उच्च जातियों वाली बीजेपी में गोविंदाचार्य जैसे लोग सोशल इंजीनियरिंग की वकालत करने लगे। राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर बेचैनी बढ़ती जा रही थी। सिर्फ अर्थतंत्र के पास इसका इलाज था लेकिन वो खुद आईसीयू में पड़ा था। फिर कांग्रेस से उसका मोहभंग हो चुका था। लोगों ने देखा कि गांधी-नेहरू की पार्टी भ्रष्टाचार की पर्याय बन गई है। उनके अपने प्रतिनिधि नेता की जगह चाटुकार मंत्री बन गए हैं। पार्टी में लोकतंत्र खत्म हो गया है। जनता को विकल्प खोजना ही था। उसे एक नए नेता की तलाश थी। जो उसकी गरीबी को दूर कर सके। बेरोजगारी पर लगाम लगाए। घिसी पिटी बातें न करे। नए सिरे से सोचे और नया सपना बेचे। कांग्रेस में ऐसा कोई नहीं था। एक तबके को लालकृष्ण आडवाणी में नेता दिखा और बीजेपी में अपना भविष्य। अर्थतंत्र की सताई जनता, मंडल और कमंडल में बंटी जनता को अपनी ऊर्जा, अपना फ्रस्टेशन कहीं न कहीं तो निकालना ही था। ऐसे में अगर नेतृत्व सही न हो तो निर्माण की जगह विध्वंस होता है। 6 दिसंबर इसका सबसे बड़ा प्रमाण बना।
आज वो हालात नहीं हैं। अर्थव्यवस्था अपने शिखर पर है। अभी पिछले ही महीने कार बिकने का नया रिकार्ड बना है। पिछले क्वार्टर में इंडस्ट्री ने 13 फीसदी की विकास दर दिखाई है। और इस बात की पूरी संभावना है कि आउटसोर्सिंग पर अमेरिकी खतरे के बावजूद अर्थव्यवस्था 9 फीसदी का आंकड़ा छू लेगी। हिंदुस्तान का मध्यवर्ग इस वक्त बम बम है। उसकी जेब गरम है। वो वीकेंड पर मॉल जाता है, जी भर के खरीददारी करता है, 'ईटिंग आउट' उसका नया पैशन है। छोटी कार से संतुष्ट नहीं होता, उसे लंबी बड़ी लक्जरी कार में मजा आता है। हर दो महीने पर वो सेलफोन बदल लेता है और गर्लफ्रेंड भी। मंदी के बावजूद तनख्वाह में कमी नहीं है। एयरपोर्ट अब रेलवे स्टेशन लगने लगे हैं। तो सड़कों पर उतरेगा कौन? फिर उसने सारे विकल्प देख लिए हैं। उनका भी जो 'रामराज' का सपना दिखाते थे और उनका भी जो 'मंडलराज को स्वर्ग' बताते थे। उसने देखा कि त्याग को हिंदुत्व का मूल बताने वाली पार्टी का 82 वर्षीय नेता नई पीढ़ी के लिए मार्ग प्रशस्त करने को तैयार नहीं होता। पिछड़े नेता का शासन 'जंगलराज' से भी बदतर था। दलित की बेटी ने भ्रष्टाचार के सारे रिकार्ड तोड़ दिए। तो क्या करेगा वो? 24 को फैसला आएगा। कुछ लोग शोर मचाएंगे, माहौल बिगाड़ने की कोशिश भी होगी लेकिन वो कामयाब तब होंगे जब उनकी कोई सुनेगा। वो इसलिए नहीं सुनेगा कि वो बहरा है? बल्कि इसलिए कि उसका पेट भरा है और वो जानता है कि फुंके हुए कारतूसों से निशाना नहीं लगता। और मैं भी अब पत्रकार हो गया हूं।

(लेखक : आईबीएन-7 के प्रबंध सम्पादक हैं) 

(साभार : www.khabar.ibnlive.in.com, 13/09/2010)

अयोध्या की पदचाप और संघ मे बदलाव की आहट


आशुतोष
ज्यादा वक्त नहीं हुआ जब मैंने लिखा था कि संघ परिवार और बीजेपी में बदलाव के संकेत मिल रहे हैं। राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद पर संघ परिवार और बीजेपी के रवैये ने मेरी धारणा को और पुष्ट किया है। अयोध्या मसले पर संघ परिवार हमेशा से ये कहता रहा है कि अदालतें आस्था के सवाल का निपटारा नहीं कर सकतीं। लेकिन अब सुर बदले हुए हैं, हमलावर तेवर गायब हैं। आज वो बड़ी मुलायमियत से कहते हैं कि वो अदालत के फैसले का सम्मान करेंगे। भारतीय संविधान के तहत कोई भी फैसला आये वो मानेंगे। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने दिल्ली में महिला पत्रकारों से कहा कि राम मंदिर पर कानूनी विकल्प खुले हैं। और अगर अदालत का फैसला संघ परिवार के खिलाफ हुआ तो लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीके से समाधान खोजने की कोशिश की जाएगी। अयोध्या मसले पर आग उगलने वाले विनय कटियार बोले वो सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगे और वहां से भी न्याय नहीं मिला तो संसद में मुद्दा उठाएंगे। लाल कृष्ण आडवाणी पहले ही पार्टी सांसदों को ताकीद कर चुके हैं कि कोई भी नेता अदालती फैसले के पहले या बाद में भड़काऊ बयान न दे और न ही जश्न मनाए।
 
दरअसल 2004 में बीजेपी की हार से संघ परिवार को झटका तो लगा था लेकिन हार के असली कारणों को खोजने की कोशिश नहीं हुई। उसे लगा कि इतिहास में ऐसा कभी-कभी हो जाता है। यही कारण है कि 2009 आते-आते बीजेपी ने एक बार फिर आडवाणी पर दांव लगा दिया। इस चुनाव को आडवाणी 'द आयरनमैन' बनाम मनमोहन 'दे वीकेस्ट' बनाने की कोशिश बीजेपी की तरफ से हुई पर उसे मुंह की खानी पड़ी। अब संघ परिवार को लगा कि हिंदू आंदोलन से निकला उनका 'सबसे मजबूत सिक्का' अगर कांग्रेस के 'सबसे कमजोर सिक्के' से मात खा गया है तो जरूर कोई ऐसी बुनियादी बात होगी जिसको वो समझने में नाकामयाब रहे। मंथन शुरू हुआ। सुधीर कुलकर्णी जैसे लोगों ने जब कहा कि संघ परिवार और बीजेपी को अपनी विचारधारा और रणनीति में मौलिक परिवर्तन करना होगा तब ऊपरी तौर पर उसे नकार तो दिया गया लेकिन उसे ये समझ में आने लगा कि तेजी से बदलते हिदुस्तान में पहले की तरह कट्टरवादी और आक्रामक नहीं रह सकते। उसे अगर सर्वसाधारण का मन जीतना है तो उस भी उसी की तरह होना होगा। ग्लोबलाइजेशन अगर नेशन-स्टेट के फर्क को खत्म कर रहा है तो देश के अंदर औद्योगिकीकरण और शहरीकरण तेजी से जाति, धर्म और क्षेत्र की सीमाओं को मिटा रहा है और ऐसे में व्यक्ति को विभिन्न खांचों मे देखने की प्रवृत्ति त्यागनी होगी।
 
संघ परिवार के शीर्ष नेतृत्व ने अंदर झांकना शुरू किया। उसे लगा कि मौलिक हिंदू धारणा को ही नए सिरे से देखने की जरूरत है। आरएसएस के एक वरिष्ठ नेता ने जब मुझसे बातचीत मे कहा कि 'हिंदू शब्द तो एकता की जगह विभाजन का प्रतीक बन चुका है' तो मैं चौंका। मुझे भी हिंदू आपस में कई खंडो में बंटा दिखा। वो हिंदू जिसको एक करने और जिसको मजबूत करने के लिये हेडगेवार ने 1925 में आरएसएस का गठन किया था। यानी जिस मकसद के लिये आरएसएस को बनाया गया जो हिंदू प्रोजेक्ट अपनाया गया वो ही आज थका मांदा हारा हुआ किसी कोने में सिसक रहा है। आज क्या संघ ये कह सकता है कि हिंदू एक है? कदापि नहीं। वो कहीं दलित है तो कहीं पिछड़ा। कहीं वो अगड़ी जाति है तो कहीं आदिवासी, कहीं मराठी, तो कहीं बिहारी, कहीं कट्टरपंथी तो कहीं उदारवादी, कहीं वो वामपंथी है तो कहीं वो दक्षिणपंथी। पिछड़ा और दलित एक दूसरे को फूंटी आंख नहीं सुहाते। सवर्णों और पिछड़ों में छत्तीस का आंकड़ा है। महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों पर हमले हो रहे हैं और ये हमले वो कर रहे है जो अपने आप को हिंदू कहते हैं और हिंदुवादी राजनीति करने का दंभ भरते हैं। हिंदू दलित बाबा साहेब आंबेडकर की अगुआई में बौद्ध होने को मजबूर हैं।

उत्तर भारत में पिछड़ी जाति अपने को मुसलमानों के ज्यादा करीब पाती है और राजनीति के मैदान में वो उसके साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलती है। सवर्ण हिंदू के साथ चलने से उसे परहेज है। उदारवादी हिंदू आज की तारीख में अल्पसंख्यकों की तुलना में कहीं अधिक कट्टरवादी हिंदुओ का विरोधी है। हकीकत तो ये है कि गुजरात के दंगे हों या फिर राम मंदिर का मसला उदारवादी हिंदू आरएसएस के हिंदू का सबसे बड़ा दुश्मन है। मुसलमानों का सबसे बड़ा रक्षक भी यही उदारवादी हिंदू है और इसी वजह से पिछले पिचासी सालों से अस्सी फीसदी हिंदूओ के देश में आरएसएस महज आठ फीसदी हिंदुओं को ही अपनी तरफ आकर्षित कर पाई है। आज की सचाई यही है कि 21 सदी में लोग हिंदुत्व शब्द सुनते ही समझने लगते हैं कि ये समुदायों के बीच जहर घोलने का कोई फार्मूला है, ये वो लोग हैं जो एक समुदाय विशेष में शत्रु तलाशते हैं, जो दंगे कराते हैं, जिनका नाम कभी गुजरात दंगों से जुड़ता है तो कभी कंधमाल से तो कभी कर्नाटक में चर्च हमले से। चर्च हमले के समय आरएसएस के एक दूसरे वरिष्ठ नेता ने अनौपचारिक बातचीत में मुझसे कहा था कि गुजरात दंगों से हमें निकलने में पांच साल लग गए। अब इसकी वजह से फिर हम दो साल पीछे हो गए। यानी संघ को एहसास है कि कंधमाल, गुजरात जैसे हादसों ने संघ के नाम और साख पर बट्टा लगाया है।
 
संघ समझ रहा है कि अब हिंदुत्व को नये सिरे से परिभाषित करना होगा। संघ की सोच मे ये बात काफी तेजी से उभरी है कि 'हिंदू' से ज्यादा 'इंडिया' पर जोर देने से वैचारिक संकट से निपटा जा सकता है। 'हिंदुत्व' की जगह 'राष्ट्रवाद' नई पीढ़ी को ज्यादा आकर्षित करेगा। इंडिया पर किसी को एतराज क्यों होगा? हिंदू बोलने पर तो मुसलमान और ईसाई भड़क सकता है लेकिन इंडिया कहने पर जुड़ना उसकी मजबूरी होगी। फिर इंडिया कहने पर जाति आधारित ब्राहमणवादी व्यवस्था का भी बोध नहीं होता। सो दलितों और पिछड़ों को भी एक झंडे के तले लाने में आसानी रहेगी। स्ट्रेटजी के तौर पर ये सोच कारगर लगती है पर सवाल ये है कि क्या इस नयी सोच को स्थाइत्व का जामा पहनाया जा सकेगा और क्या हिंदुत्व के नाम पर लामबंद होने वाला स्वयंसेवक इस वैचारिक बदलाव के लिये तैयार है? मोहन भागवत के लिए ये आसान नहीं है लेकिन अयोध्या पर बदले सुर मुझे भरोसा देते हैं।

(लेखक : आईबीएन-7 के प्रबंध सम्पादक हैं) 

(साभार : www.khabar.ibnlive.in.com, 20/09/2010)

Tuesday, October 26, 2010

अयोध्या फैसले के निहितार्थ

पवन कुमार अरविंद
 
बहुत शोर सुनते थे पहलू में दिल का, जो चीरा तो कतरा ए खून न निकला। 
ठीक इसी प्रकार 24 सितम्बर को श्रीराम जन्मभूमि के स्वामित्व विवाद मामले में अदालती फैसले के मद्देनजर कई प्रकार की आशंकाएं व्यक्त की जा रही हैं। इन आशंकाओं में देश भर में हिंसा भड़कना भी शामिल है। कहा जा रहा है कि देश भर में काफी बावेला मच सकता है। फैसला जिसके पक्ष में नहीं आएगा, वह पक्ष खूनी खेल खेल सकता है। लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं होगा। यदि सामान्य तौर पर सोचा जाए तो हिंसा भड़कने का कहीं कोई आधार नहीं दिखता है, क्योंकि यह अदालत का आखिरी फैसला नहीं है। इसके बाद भी कई प्रकार के न्यायिक और लोकतांत्रिक विकल्प शेष हैं।

इस मामले में फैसला जिसके पक्ष में नहीं आएगा वह पक्ष उच्चतम न्यायालय में निश्चित रूप से अपील करेगा, इसमें कहीं कोई शंका नहीं है। इस संदर्भ में पूरे देश भर में झूठ में चिल्ल-पों मची हुई है। वास्तविकता यह है कि होगा कुछ नहीं। क्योंकि 1992 के बाद से गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती में काफी पानी बह चुका है। एक 1992 का दौर था और एक आज का दौर है। इतने वर्षों में एक पीढ़ी बदल चुकी है और यदि नहीं बदली तो बूढ़ी जरूर हो चुकी है। इसके साथ ही दोनों पीढ़ियों के लोगों की सोच में जमीन-आसमान का अंतर है।

एक यह बात भी पते की है कि आज का युवा सामाजिककम और प्रोफेशनलज्यादा हो गया है। हर क्षण उसको अपने करियरकी ही चिंता लगी रहती है। इस कारण भी उसका इस प्रकार के संघर्षों में ऱूचि नहीं के बराबर है। दुनिया का कोई राजनीतिक व सामाजिक आंदोलन हो या संघर्ष हो, उसमें युवाओं की ही प्रमुख भूमिका देखी गई है। बिना युवाओं की भागीदारी के इस प्रकार के कार्यक्रम या अभियान सफल नहीं हो सकते। युवाओं का यदि ऐसा रुख है तो उसका भी एक कारण है। आज का युवा शांति का पक्षधर ज्यादा है। इसके अलावा भी सभी शांति चाहते हैं। सुख-चैन की जिंदगी सबको प्रिय है। हालांकि, सुख व चैन की जिंदगी जीने की मनुष्य की इच्छा कोई नई बात नहीं है, यह उसकी सदा-सर्वदा से इच्छा रही है। तो आखिर ये बावेला कौन मचाएगा ?

लेकिन इतना सब कुछ होते हुए भी जब सत्य और असत्य का प्रश्न आएगा तो पूरा देश उठ खड़ा होगा। इस बात को किसी भी तर्क से काटा नहीं जा सकता। क्योंकि सत्य और असत्य क्या है, सब जानते हैं। सबको भलीभांति मालूम है। इस सृष्टि में जो कुछ भी है उसका होना सत्य है और जो कुछ भी नहीं है उसका न होना सत्य है। यह होने और न होने का क्रम समय के साथ-साथ चलता ही रहता है। मनुष्य के जीवन में कभी-कभी ऐसी भी परिस्थितियां आती हैं कि जो दिखता है वह सत्य नहीं होता। हर पीली दिखने वाली वस्तु सोना नहीं हुआ करती।

सत्य यही है कि दशरथ नन्दन श्रीराम सूर्यवंश के 65वें प्रतापी राजा थे। वह इस सृष्टि के आदर्श महापुरुष योद्धा थे। उनका जन्म अयोध्या में अपने पिता महाराजा दशरथ के राजमहल में हुआ था। फिरभी उनके जन्मस्थान के स्वामित्व का मामला वर्षों से अदालत में लंबित है। सभी जानते हैं कि सत्य क्या है। फिरभी मामला लंबित है। लेकिन न्यायालय को इस सत्यता से क्या लेना देना। न्यायालयीन प्रक्रिया के लिए केवल सबूत की आवश्यकता होती है। विश्वास, आस्था और श्रद्धा न्यायालय के विषय नहीं हैं।

हालांकि, मुकदमेबाजी की पूरी प्रक्रिया को सत्य के अपमानित होने का कालखंड कह सकते हैं। लेकिन सत्य केवल अपमानित ही हो सकता है, पराजित नहीं। यह सृष्टि का नियम है। न्यायालय के हर फैसले में देशवासियों की पूर्ण श्रद्धा है। न्यायालय ईश्वर का दूसरा रूप है। इसलिए फैसला किसी के भी पक्ष में आए, वह ईश्वरीय माना जाएगा। और इस कारण अन्ततः भगवान श्रीराम की ही विजय होगी। सृष्टि का एक यह भी सत्य है कि सत्यकी लड़ाई अंत तक और सत्यको पा लेने तक लड़ी जाती है। धैर्य, उत्साह व स्वाभिमानपूर्वक लड़ी गई लड़ाई ही तपस्या है और सफलता के लिए तपस्या आवश्यक है। इसलिए शांति बनी रहेगी।

(साभार : विस्फोट डॉट कॉम, 21सितम्बर, 2010)

राममंदिर बनवाएं, भाईचारा बढ़ाएं

अनिल सौमित्र


रामजन्मभूमि बनाम बाबरी मस्जिद पर फैसला आने ही वाला है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने बहुप्रतीक्षित रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद के मुकदमे में सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित कर लिया है। उच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ के न्यायाधीश न्यायमूर्ति एस.यू. खान, न्यायमूर्ति डी.वी. शर्मा एवं न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल हैं। चूंकि न्यायमूर्ति डी.वी. शर्मा सितंबर के अंत में सेवानिवृत्त होने वाले हैं। इसलिए माना जा रहा है कि रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद के बारे में फैसला सितंबर महीने के पूर्व कभी भी आ सकता है।


लेकिन इस मसले पर आम मुसलमान और मुस्लिम संगठनों की चुप्पी रहस्यमय दिखती है। क्या यह तूफान के पहले की शांति है! उर्दू मीडिया ने पहले से ही कहना शुरु कर दिया है कि न्यायालय का निर्णय हिन्दुओं के पक्ष में आ सकता है। इस मामले में मुस्लिम संगठनों के दोनों हाथों में लड्डू दिखता है। अगर निर्णय उनके पक्ष में आया तो वे नष्ट हो चुके जर्जर बाबरी मस्जिद ढांचे के स्थान पर भव्य मस्जिद की मांग सरकार के सामने रखेंगे। अगर हाईकोर्ट का निर्णय सुन्नी वक्फ बोर्ड के खिलाफ और हिन्दू पक्षकारों के पक्ष में हुआ तो क्या होगा? न्यायालय के निर्णय के संदर्भ में सबसे अहम बात तो यह है कि जिन संगठनों या व्यक्तियों की ओर से न्यायालय में पक्ष रखा जा रहा है क्या उन्हें अपने कौम का समर्थन और सहमति प्राप्त है? संभव है न्यायालय के निर्णय के बाद हिन्दुओं या मुसलमानों का कोई संगठन यह कह दे कि हमें निर्णय मंजूर नहीं, क्योंकि यह हमारे श्रद्धा-आस्था या अक़ीदत का मामला है। ये अलग बात है कि मुस्लिम संगठनों ने इसे अपनी इज्जत का मामला बना रखा है।


उल्लेखनीय है कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के तीन न्यायाधीशों की पूर्ण पीठ वर्ष 1996 से इस विवाद की सुनवाई कर रही थी। मुकदमे में चार पक्षकार हैं। हिंदुओं की ओर से तीन पक्षकार हैं जिसमें एक प्रमुख पक्षकार विवादित परिसर में विराजमान रामलला स्वयं हैं। दूसरे श्री गोपाल सिंह विशारद और तीसरा निर्मोही अखाड़ा हैं, जबकि मुस्लिम पक्ष की ओर से सुन्नी मुस्लिम वक्फ बोर्ड पक्षकार है। गोपाल सिंह विशारद ने रामलला के एक भक्त के रूप में निर्बाध दर्शन-पूजन की अनुमति के लिए जनवरी,1950 ईस्वी में अपना मुकदमा फैजाबाद जिला अदालत में दायर किया था। वर्ष 1959 में निर्मोही अखाड़े ने अपना मुकदमा जिला अदालत में दायर कर अदालत से मांग की थी कि सरकारी रिसीवर हटाकर जन्मभूमि मंदिर की संपूर्ण व्यवस्था का अधिकार अखाड़े को सौंपा जाय। दिसंबर, 1961 में सुन्नी वक्फ बोर्ड अदालत में गया। बोर्ड ने अदालत से मांग की कि विवादित ढांचे को मस्जिद घोषित किया जाए, वहां से रामलला की मूर्ति और अन्य पूजा सामग्री हटाई जाएं तथा परिसर का कब्जा सुन्नी वक्फ बोर्ड को सौंपा जाए। जुलाई, 1989 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश श्री देवकीनंदन अग्रवाल ने एक भक्त के रूप में खुद को रामलला का अभिन्न मित्र घोषित करते हुए न्यायालय के समक्ष रामलला की ओर से वाद दाखिल किया। 40 साल तक मुकदमा फैजाबाद जिला अदालत में लंबित पड़ा रहा। शीघ्र सुनवाई के लिए उच्च न्यायालय के आदेश से सभी मुकदमे सामुहिक सुनवाई के लिए उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ को सौंपे गए। गौरतलब है कि राष्ट्रपति द्वारा सर्वोच्च न्यायालय से वर्ष 1993 में एक प्रश्न पूछा गया था कि क्या विवादित स्थल पर 1528 ईस्वी के पहले कभी कोई हिंदू मंदिर था अथवा नहीं? इसी प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए उच्च न्यायालय ने विवादित परिसर की राडार तरंगों से फोटोग्राफी और पुरातात्विक खुदाई भी करवाई। जजों के सेवानिवृत्त होते रहने के कारण उच्च न्यायालय की विशेष पीठ का लगभग 13 बार पुनर्गठन हो चुका है। अंतिम पुनर्गठन 11 जनवरी, 2010 को हुआ।


इसी बीच 6 दिसंबर, 1992 को विवादित ढांचा हिन्दुओं ने जमींदोज कर दिया। अक्तूबर, 1994 में सर्वोच्च न्यायालय ने विवाद के मामले में अंतिम निर्णय की सारी जिम्मेदारी उच्च न्यायालय के हवाले कर दी। तब से उच्च न्यायालय इस मामले की निरंतर सुनवाई कर रहा है। उच्च न्यायालय ने मामले की सुनवाई के लिए विशेष अदालत का गठन कर संपूर्ण मामला दो हिंदू और एक मुस्लिम जज की पूर्ण पीठ के हवाले कर दिया। शायद इसके पीछे यह सोच रही हो कि मुसलमानों के साथ कोई अन्याय न हो जाये। इसीलिए एक मुसलमान जज भी पीठ में रखा गया।


हालांकि न्यायालय में सुन्नी वक्फ बोर्ड और निर्मोही अखाडा आमने-सामने है, लेकिन अदालत के बाहर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी और विश्व हिन्दू परिषद् है। इनके अलावा भी हिन्दुओं और मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठन हैं। आम हिन्दुओं को डर सता रहा है कि अदालत का फैसला खिलाफ आने पर आम मुसलमान किसकी सुनेगा, किसकी नहीं सुनेगा? मुस्लिम जनता हमेशा अपने कट्टर नेतृत्व का कहा ही मानती आई है। देश विभाजन के समय से लेकर शाहबानों, तस्लीमा, घुसपैठ, आतंकवाद समेत ऐसे अनेक मामले हैं जिन पर उदार मुस्लिम नेतृत्व को मुंह की खानी पड़ी है। आम मुसलमान कट्टर और रूढ़िवादी नेतृत्व की ही सुनता आया है। बंगलादेशी घुसपैठियों का मामला हो या आतंकी और आतंकी संगठनों को पनाह देने का मामला, आम मुसलमानों का सहयोग हमेशा इन्हें ही मिलता आया है। आज भले ही बाबरी एक्शन कमेटी के संयोजक और अदालत में मुसलमानों की तरफ से पैरवी कर रहे जफरयाब जिलानी और बाबरी एक्शन कमेटी के संस्थापक रह चुके जावेद हबीब न्यायालय का फैसला मानने और किसी आंदोलन के इरादे को नकार रहे हों, लेकिन क्या पता कल हिन्दुओ के खिलाफ डायरेक्ट एक्शन’’ का फतवा या आह्वान आ जाये। बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी की हालत भले ही खराब हो चुकी हो, लेकिन इतनी भी खराब नहीं कि देश का मुसलमान उनकी बातों की अनदेखी कर दे। मुसलमानों के लिए देश के भीतर और बाहर संघर्ष करने वालों की कमी नहीं है। कांग्रेस समेत देश की सभी राजनैतिक पार्टियां, सरकारें, न्यायालय, मीडिया और अ-हिन्दू भारतीय सब मुसलमानों के प्रति जरूरत से ज्यादा संवेदनशील हैं। मुसलमान अपनी मर्जी से न्यायालय का और न्यायाधीश का चयन कर सकता है। उसके लिए गुजरात का मामला दिल्ली में और मध्यप्रदेश का मामला मुम्बई में ले जाया जा सकता है। जो काम हिन्दुओं के लिए पूरा संघ परिवार नहीं कर सकता वह अकेले जफरयाब जिलानी कर सकते हैं, बखूबी कर रहे हैं। अगर मामला मुसलमानों से जुड़ा हो तो न्यायालय की सुनता कौन है? शाहबानों और अफजल का उदाहरण सबके सामने है। एक में कांग्रेस ने कानून बना कर सर्वोच्च न्यायालय को आइना दिखाया तो दूसरे में सजा का क्रियान्वयन ही रोक दिया। जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर-फारुख अब्दुल्ला ने खुलेआम कहा कि अफजल को फांसी देने से कश्मीर के हालात बिगड़ सकते हैं।


पुराने अनुभव तो यही बताते हैं कि आम मुसलमान अपने कट्टरपंथी नेतृत्व के साथ पहले न्यायालय पर दबाव बनायेंगे, फैसला अनुकूल आया तो ठीक वर्ना कह देंगे- फैसला कूड़ेदान के लायक है। केन्द्र सरकार समेत अनेक आयोग उस कचरे को सुरक्षित करने के लिए कूड़ेदान की तलाश में लग जायेंगे। न्यायालय का फैसला न मानने के लिए वोट की राजनीतिका दबाव तो मुसलमानों के लिए हमेशा से उपलब्ध है ही। देश के प्रधानमंत्री भी देश के संसाधनोंपर मुसलमानों का पहला हक देकर उनके वोट पर अपना पहला और आखिरी हक अख्तियार करना चाहते हैं। उन्हें अपराध या आतंक के लिए आरोपी मत बनाइये, क्योंकि वे मुसलमान हैं। उन्हें न्यायालय में अपराधी या आतंकी सिद्ध करने का प्रयास मत कीजिये क्योंकि वे ‘‘बेचारे मुसलमान’‘ हैं। सजा सुनाये जाने के बाद भी उसे लागू मत कीजिये क्योंकि उससे अल्पसंख्यकों में तनाव पैदा होने, मानवाधिकार को चोट पहुंचने का खतरा है। अब हिन्दू बेचारा क्या करे। कब तक वह तथाकथित सेक्यूलर संविधान और न्याय व्यवस्था पर भरोसा करे। शायद इसीलिए विहिप जनता के न्यायालयमें जाने को विवश हुई हो। विहिप या संघ परिवार का प्रयास देश की जनता-जर्नादन को जागृत करने का है। ताकि इससे देश की राजनैतिक व्यवस्था पर कोई प्रभाव पड़े। संभव है ‘‘बहुसंख्यक दबाव की राजनीति’’ का कुछ असर हो जाये और राम मंदिर विवाद का समाधान जनता के सदन संसदमें हो जाये।


सच बात तो यह है कि न तो हिन्दुओं को चिढ़ाने या अनावश्यक जिद्द करने से मामला सुलझने वाला है और न ही मुसलमानों के तुष्टीकरण से। विभिन्न राजनैतिक दल अगर ईमानदार प्रयास करें तो अयोध्या विवाद का राजनैतिक हल निकल सकता है। इस मामले में मुसलमानों के उदार नेतृत्व को आगे आना ही होगा। पहल उन्हें ही करनी है। समस्या निराकरण नुख्सा उन्ही के पास है। अमन पसंद और विकास की चाहत रखने वाले राजनैतिक दल आगे आएं तो समस्या का निराकरण और भ्री आसान हो जायेगा। सोमनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार कर कांग्रेस और उनके नेताओं न एक नजीर पेश की है। अयोध्या समझदारी का दूसरा उदाहरण हो सकता है। कांग्रेस पहल करे, भाजपा और अन्य दल मदद करें- राम मंदिर की भव्यता का प्रश्न संसद से हल करें। यह शांति और भाइचारे का तकाजा भी है।
(लेखक : सामाजिक कार्यकर्ता हैं)
(साभार : विस्फोट.कॉम, 19/09/2010)

तेलंगाना को चाहिए अयोध्या जैसी कोशिश

राधा विश्वनाथ

आयोध्या के साठ साल पुराने राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद विवाद में उच्च न्यायालय का फैसला आया, तो पूरे देश ने राहत की सांस ली। राहत की यह बात इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस मसले पर सांप्रदायिक तनाव पैदा हो जाने का एक इतिहास रहा है। इस बार भी तनाव भड़क जाने के अंदेशे इस कदर थे कि पूरे देश में रेड अलर्ट जारी कर दिया गया था। देश के बहुत से हिस्सों में स्कूल-कॉलेज बंद कर दिए गए थे और सुरक्षा के इंतजाम इतने कड़े कर दिए गए थे, जितने कि पहले कभी नहीं रहे।


इलाहाबाद उच्च न्यायलय की लखनऊ पीठ ने भी इस बात का पूरा ख्याल रखा कि फैसला आने से पहले ही उसे लेकर अफवाहों का दौर न शुरू हो जाए। फैसले के बाद किसी तरह की जीत का जश्न न मनाया जा सके, इसके लिए प्रशासन ने भी तमाम पाबंदियां लगा दी थीं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, गृह मंत्री पी चिदंबरम और यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी ने लोगों से सद्भाव बनाए रखने की अपील की थी। सभी राजनैतिक दलों ने अपने कार्यकर्ताओं को हिंसा से दूर रहने का संदेश भेजा था।अयोध्या फैसले के इस संदर्भ को आंध्र प्रदेश के मसले पर याद रखना जरूरी है। वहां तेलंगाना मसले पर भावनाएं और तापमान, दोनों ही आसमान पर हैं। इस पर फैसले के लिए पिछले साल के अंत में जस्टिस श्रीकृष्णा समिति बनाई गई थी, उसे दिसंबर में अपनी रिपोर्ट देनी है। राम-जन्मभूमि विवाद की तरह ही यहां अलग राज्य का मसला किसी भी हद तक भावनाओं को भड़काने का काम कर सकता है। पिछले एक दशक से यह मसला राजनीति की आंच पर उबल रहा है। पिछले दो विधानसभा चुनाव इसी मसले पर लड़े गए हैं। प्रदेश के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के छात्र इस विवाद के बड़े सूत्रधार रहे हैं और पिछले कुछ समय से एक भी दिन ऐसा नहीं गुजरता, जब इस मसले पर छात्रों के विरोधी गुटों में कोई झड़प न होती हो।


यह हिंसा सिर्फ परिसरों तक ही सीमित नहीं है। पूर्व मुख्यमंत्री चंद्राबाबू नायडू के काफिले पर तेलंगाना कार्यकर्ता पथराव तक कर चुके हैं। जब वह महबूबनगर जा रहे थे, तो इस पथराव में उनके काफिले के कई लोग घायल भी हो गए। अब उनकी पार्टी तेलुगू देशम के पास इसे लेकर दो मुद्दे हैं। एक यह कि राज्य में कानून व्यवस्था की स्थिति खराब होती जा रही है और दूसरा यह कि जब वे इस पथराव के बाद किसी तरह हैदराबाद पंहुचे, तो उन्हें थाने में एफआईआर नहीं लिखाने दी गई।


अब यह मसला विधानसभा की विशेषाधिकार समिति के पास है और वहां राजनैतिक समीकरण बदल रहे हैं। कुछ महीने पहले तक तेलंगाना राज्य समिति के लिए कांग्रेस ही मुख्य खलनायक थी। समिति के अध्यक्ष चंद्रशेखर राव और अन्य वरिष्ठ नेताओं का अरोप था कि राज्य के विभाजन की मांग कांग्रेस ही रोक रही है। वे अलग-अलग क्षेत्रों के कांग्रेस नेताओं के मतभेद की बातें करके उसका मजाक भी उड़ाया करते थे। ऐसे मतभेद तेलुगू देशम में भी हैं लेकिन तब वह इस मसले से किनारा कर रही थी। लेकिन अब हालात बदल गए हैं। अब तेलुगू देशम और तेलंगाना राज्य समिति आमने-सामने हैं। कांग्रेस चुप्पी साध रही है। तेलुगू देशम इस बात से परेशान है कि बड़ी संख्या में उसके कार्यकर्ता तेलंगाना समिति में चले गए हैं। इससे नाराज नायडू ने अब तेलंगाना समिति और उसके नेता चंद्रशेखर राव पर निशाना साधना शुरू कर दिया है। उनकी पार्टी राव को अवसरवादी कह रही है और उन पर अपने परिवार को आगे बढ़ाने का आरोप लगा रही है। लेकिन ऐसा क्या हो गया कि समिति ने कांग्रेस को छोड़कर तेलुगू देशम पर निशाना साधना शुरू कर दिया है। और चंद्रशेखर राव ने पिछले दिनों विजयवाड़ा के कांग्रेस सांसद एल राजगोपाल की काफी तारीफ भी की। राजगोपाल कभी कांग्रेस में राव के सबसे बड़े आलोचकों में से थे। इससे ये अटकलें भी लगने लगी हैं कि तेलंगाना के मसले पर कांग्रेस और राव में कोई गुप्त समझौता हो गया है। उधर तेलंगाना को राज्य का दर्जा दिए जाने का एक और मोर्चा खुल गया है। इसके नेता माओवादी समर्थक गद हैं, जिन्होंने तेलंगाना प्रजा समिति का निर्माण किया है। उन्होंने इसकी स्थापना का मकसद राव और उनकी समिति से आंदोलन का नेतृत्व छीनना बतलाया।


राज्य में चल रहीं इस तरह की सारी गतिविधियां काफी महत्वपूर्ण हो गई हैं। खासतौर पर इसलिए, क्योंकि ये कृष्णा समिति द्वारा राज्य सरकार को रिपोर्ट सौंपने से कुछ ही हफ्ते पहले हुई हैं। और ये आग में घी डालने का काम कर सकती हैं। अब यह जरूरी है कि केंद्र और राज्य मिलकर हालात को बिगड़ने न दें।

(लेखिका : वरिष्ठ पत्रकार हैं)

(साभार : दैनिक हिन्दुस्तान, 8/10/2010)